[दीवान]और फेसबुक से जाते-जाते थानवीजी ने सोशल मीडिया की अपनी परिभाषा बदल लीः
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Mar 16 10:30:37 CDT 2016
अभी कुछ मिनट पहले थानवीजी ने फेसबुक से विदा लेने की बात कही है. एक लंबी
पोस्ट में उसकी जो वजह बताया है उसमे तात्कालिक कारण के साथ-साथ उनकी वो
हसरतें भी शामिल हैं जिनके बारे में वो मौके-बेमौके पहले भी चर्चा कर चुके
हैं. लिहाजा- खूब पढ़ना, खूब सारी फिल्में देखना और घूमना-फिरना.
ये सारे काम तो वो अब भी करते आए हैं..और सच बात तो ये है कि ये सब कर रहे हैं
तभी तो फेसबुक के लिए माल भी निकलकर आ पाता है. नहीं तो सिर्फ जिंदाबाद, जय-जय
के नारे लगाने के लिए ही फेसबुक आना होता तो इतनी आत्मीय पोस्ट लिखकर क्यों
विदा होते ? वक्त-बेवक्त फेसबुक से जो वो आहत होते रहे हैं, उनके बीच भी काफी
कुछ हासिल है जिन्हें वो एन्ज्वॉय भी करते रहे हैं और एक खास किस्म का मोह भी
पैदा हुआ है. नहीं तो जिस अंदाज में आज उन्होंने विदाई पोस्ट लिखी है और जिससे
एक तरह से सोशल मीडिया परिभाषित होता जान पड़ता है, चार साल पहले कभी नहीं
लिखते.
आज से कोई चार साल पहले अविनाश ने मोहल्लालाइव के तहत बहसतलब का आयोजन किया
था. विषय तो हूबहू याद नहीं लेकिन वक्ता के तौर पर थानवीजी ने इसकी पत्रकारीय
जरूरत को सिरे से खारिज कर दिया था. मुझे अब भी याद है कि उन्होंने सोशल
मीडिया को पत्रकारिता हिस्सा बिल्कुल भी नहीं माना. इसी मंच पर प्रो. सुधीश
पचौरी माहौल को देखते हुए, विश्वदीपक के सवाल के जवाब से पूरी तरह कन्नी काटते
हुए मंच बटोरू वक्तव्य तो जरूर दिए लेकिन अनौपचारिक बातचीत में सोशल मीडिया पर
सक्रिय लोगों को दिमागी गुंड़े बताने से अपने को रोक नहीं पाए. प्रो. सुधीश
पचौरी ने सोशल मीडिया को कभी भी सकारात्मक रूप में नहीं लिया और उनकी पूरी
बातचीत से ये अंदाजा लगाना बेहद आसान रहा है कि उन्हें इससे संबंधित सारी
सूचनाएं एवं जानकारियां दोएम दर्जे के माध्यमों से मिलती रही है. कभी खुद इससे
करीब से गुजरना जरूरी नहीं समझा. बहरहाल
उस परिचर्चा के कुछ महीने बाद से थानवीजी सोशल मीडिया खासकर फेसबुक पर सक्रिय
हुए..सक्रिय क्या हुए बाकायदा उनकी पत्रकारिता की स्कूल चलती है. गंभीर पाठक
से लेकर लौंड़े-लफाड़े तक के लोगों को संजीदगी से जवाब देते हैं. चुटकी लेते
हैं और लगातार उन सामयिक मुद्दों पर अपनी टीप देते हैं जिनके बारे में आमतौर
पर मीडिया और अकादमिक दुनिया के लोग बचते रहे हैं. लिहाजा उनकी टाइमलाइन हमेशा
गुलजार रहती है. केशव के कार्टून को शेयर करने में थानवीजी को अतिरिक्त आनंद
आता है और हमें उनसे दोबारा गुजरकर.
अब मैं ये कहूं कि सोशल मीडिया पर थानवीजी की सक्रियता ने हम जैसे दर्जनों
पाठक-दोस्तों को एक दूसरे थानवीजी से परिचय कराया है तो गलत नहीं होगा. वो
थानवीजी जो जनसत्ता के संपादक नहीं हैं. एक बिंदास टिप्पणीकार हैं और जिन्हें
सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे, पर्यावरण और कला पर ही बात करने में अभिरूचि
नहीं है बल्कि प्रेमलताजी गैरमौजूदगी में उनकी हिदायत को धता बताते हुए मिठाई
खाने की चर्चा करने में रस मिलता है. जो जिंदगी की छोटी-छोटी घटनाओं को व्यापक
संदर्भ से जोड़ने में भरपूर शाब्दिक पैंतरेबाजी करते हैं और सबसे ज्यादा हम
जैसे लठ्ठमार बदनाम ब्लॉगर जहां प्रतिरोध करने से चूक जाते हैं, वहां थानवीजी
की कीबोर्ड की बारीक तुरपई काम करती है. और तब लगता है कि वो आज से चार साल
पहले कही गई बात से काफी आगे निकल गए हैं. मेरी तो यही कामना है कि बाकी के
लोग भी ऐसी गांठ से बाहर निकलें.
आज जब जाते-जाते उन्होंने लिखा कि फेसबुक महज आभासी माध्यम नहीं है. यहां कई
दोस्त बने..सच बात तो ये है कि गर थानवीजी फेसबुक पर इतने सक्रिय नहीं होते तो
हमारी जमात के लोग उन्हें अपने करीब इतना नहीं पाते. आखिर जात-बिरादरी भी तो
एक चीज हुआ करती है.
उनके जाने का सबसे ज्यादा नुकसान उन अखबारों, न्यूज चैनलों और पत्रिकाओं को
होगा जो उनकी वॉल से स्टोरी आइडिया मारने का काम करते आए हैं..हमारा नुकसान तो
खैर है ही. लेकिन चूंकि वो जब खुद ये लिख रहे हैं कि उनका फेसबुक से जाना
गुजरे वक्त की तरह जाना नहीं है तो हम वक्त के लौटने का इंतजार तो करेंगे ही.
[image: Vineet Kumar's photo.]
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