[दीवान]"उजरा गाँव में ऊँ आइल, लोग कहे बलबले हौ !!"
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Sat Nov 12 07:25:58 CST 2016
जी हाँ, उजड़े हुए गांव में अगर किसी ने 'ऊँ' की आवाज़ भर सिसकारी भी ली, तो
तमाम दूरंदेशों ने अपनी ओर से ये घोषित करने में रत्ती भर देर
नहीं लगायी कि बस ये तो बुलबुल की ही आवाज़ है। उजड़ गाँव के ऐसे ही एक
धुरंधर लालबुझक्कड़ हैं सुरजीत भल्ला साहब। अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से
अर्थशास्त्र में भारी -भरकम उपाधि प्राप्त हमारे भल्ला साहब की वैसे तो जितनी
ही तारीफ़ की जाये कम है। लेकिन इनका आप से परिचय करवाने के लिए शायद इतना ही
कहना काफी हो कि फ़िलवक़्त न्यूयॉर्क स्थित ऑब्जर्वेटरी ग्रुप में सीनियर इंडिया
एनालिस्ट का पद सुशोभित कर रहे सुरजीत भल्ला साहब इंडियन एक्सप्रेस के
कांट्रिब्यूटिंग एडिटर भी हैं। और, अमेरिका में मुकामशुदा भल्ला साहब कितने
माहिर 'ऑब्जर्वर' हैं इसकी एक छोटी सी बानगी है उनकी हालिया राष्ट्रपति चुनाव
में हिलेरी क्लिंटन की डोनाल्ड ट्रम्प पर धुआंधार और एकतरफा जीत की यथार्थ के
धरातल पर औंधे मुहँ गिरी भविष्यवाणी।
मगर, दीवान के पाठकों से मेरी पहली गुजारिश यही है कि वे भल्ला साहब की
क़ाबिलियत का एकतरफ़ा निर्णय केवल अमेरिकी चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में की गयी
उनकी गलत साबित हुयी भविष्यवाणी के आधार पर ही न करें। क्योंकि मेरी आप
से ऐसी प्रार्थना के पीछे एक ठोस वजह है। अब देखिये बात यों है कि भल्ला साहब
कोई प्रशिक्षित चुनाव विश्लेशक तो हैं नहीं, वो तो अर्थशास्त्र के जानकार हैं।
इस लिए हमें भी उनकी दूरंदेशी का ठीक ठीक अंदाज तो अर्थशास्त्र और
ख़ासकर भारतीय अर्थतंत्र या समाज के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त की गयी उनकी सही
या ग़लत समझ से ही लग सकता है। फिर इसी बिंदु पर केंद्रित है आज जनसत्ता डॉट
कॉम पर प्रकाशित उनका ब्लॉग भी।
अपने इस ब्लॉग में जहाँ एक ओर भल्ला साहब हजार और पांच सौ रुपये के नोटों की
बदली के मोदी सरकार के फैसले को अतीत में जमा हुए काले धन पर एक 'असरकारी'
चोट साबित करते दीखते हैं। वहीँ दूसरी ओर वे भविष्य में काला धन कैसे फिर
न पैदा होने पाए जैसी एक ग़ैरमामूली चुनौती के प्रति भी पर्याप्त सचेत नजर आते
हैं। जो वाकई बेहद दिलचस्प है। क्योंकि काले धन की उत्पादक व्यवस्था को ध्वस्त
करने के लिए सुरजीत भल्ला साहब नीतियों के स्तर पर कई एक जरुरी बदलावों की
वकालत करते हैं।
लेकिन मोदी सरकार को दिए जा रहे सुझावों में जिस बात पर भल्ला साहब का सबसे
ज्यादा ज़ोर है वो ये कि "आम आदमी और गरीब आदमी के नाम पर अर्थव्यवस्था को बंधक
बनाने की वकालत और कोशिशों को बंद किया जाना चाहिए, तभी मोदी सरकार बड़े पैमाने
पर टैक्स सुधार की प्रक्रिया अपना सकती है। और जब बीजेपी ऐसा कर लेगी तभी उसे
पवित्र गाय से जुड़े मुद्दों पर आक्रामक रूख अख्तियार करना चाहिए। अब इसकी नई
शुरुआत हो चुकी है। अब वक़्त उस सफर को पूरा करने का है।" मेरे विचार से भल्ला
साहब जैसे दोमुहें 'लिबरल' आर्थिक विश्लेषक-चिंतक द्वारा ऐसी आपत्तिजनक भाषा
के प्रयोग और बाद को गाय के मुद्दे पर आक्रामक रूख अख्तियार करने की बीजेपी को
सलाह की जितनी कड़े शब्दों में निंदा की जाये वह कम ही है। साफ़ शब्दों में कहूँ
तो अमेरिकी समाज के लिए ओबामा केयर जैसी दूसरी तमाम राज्य समर्थित कल्याणकारी
योजनाओं के समर्थन में तत्परता से हाँथ उठाये दिखने वाले कई टटपूंजिये बौद्धिक
भारत का सन्दर्भ आते ही टैक्स सुधारों और अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर
गरीबों और आम आदमी का जीने का अधिकार भी छीन लेने की वकालत करते हुए जरा भी
नहीं संकुचाते। अब ये सोच का दोमुहाँपन नहीं तो और क्या है?
खैर, ऐसे नमकहरामों की बात भारत का सत्तानशीन वर्ग हमेशा से सुनता आया है और
उनकी विशेषज्ञों के रूप में अपार ख्याति की भी एक बड़ी वजह 'जो बीमार को भावे,
वही बैदा सुझावे' वाली दृष्टि और सोच रही है। लेकिन भल्ला साहब जैसे
तीसमारखाँ से एक छोटा सा सवाल यह भी पूछना बनता है कि, जिस मुल्क में सुप्रीम
कोर्ट के तमाम इसरार पर भी ऱिजर्व बैंक और सरकार देश के अलग-अलग बैंकों का 85
हजार करोड़ रुपया दबा कर बैठे 57 लोगों का नाम तक सार्वजनिक नहीं करने पर अड़े
हों, वहां काले धन की अर्थव्यवस्था पर असरकारी चोट और आर्थिक पुनर्निर्माण का
काम भला किस बूते होगा? फिर ऐसे में मोदी सरकार से 'नई शुरुआत' और 'सफ़र' पूरा
होने तक दम न लेने जैसी बातें कहते हुए क्या सुरजीत भल्ला साहब को ख़ुद पर हँसी
भी नहीं आती !?
*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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