[दीवान]अमित शाह के 'पॉलिटिक्स ऑफ परफोर्मेंस' जैसे ज़ुमले की हक़ीक़त

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Sun Nov 20 09:36:21 CST 2016


भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इन दिनों उत्तर प्रदेश की चुनावी जमीन को
पार्टी के लिए तैयार करने के काम में दिलोजान से जुटे हुए हैं। वहीँ एक सभा को
संबोधित करते हुए कल अमित शाह ने एक बड़ी रोचक बात कही है। उनका कहना है कि
दूसरी तमाम राजनैतिक पार्टियों की तरह भाजपा जातिवाद या परिवारवाद की राजनीति
नहीं करती। भाजपा तो 'पॉलिटिक्स ऑफ परफोर्मेंस' की लाइन पर चलना चाहती है।
जाहिर सी बात   है कि ऐसा कहते हुए भाजपा अध्यक्ष दरअसल यू पी की राजनीति में
असरकारी हैसियत रखने वाली दोनों प्रतिद्वंदी पार्टियों यानी बसपा और सपा पर
सीधा निशाना साधना चाह रहे थे। लेकिन बात क्या इतनी भी सीधी है?
दरअसल अपना चुनावी अभियान चला रहे अमित शाह जब उपरोक्त बातें कह रहे थे तो
उनके जेहन में अपने ऐसे बेबुनियादी दावों के आतुर खरीददारों की छवि भी पूरी
तरह साफ़ थी। उनका संदेश खासकर युवा मतदाताओं के लिए है, इस बात को ले कर भाजपा
अध्यक्ष अपने कल के संबोधन में पूरी तरह सतर्क भी नज़र आते हैं।
तभी तो लोकतंत्र में जातिवाद से ऊपर उठने का आह्वाहन करने के साथ ही साथ अमित
शाह युवा मतदाताओं को यह बताना नहीं भूलते कि, 'मोदी सरकार काले धन के मामले
में किसी को नहीं बख्शेगी। मैं मानता हूँ कि करोड़ों रुपये के काले धन पर सिर्फ
*युवाओं* का अधिकार है।' साथ ही, उत्तर प्रदेश के करोड़ों युवाओं को याद दिलाते
हुए एक यह भी मांग उन्होंने रखी कि 'इतिहास युवा बनाता है, परिवर्तन युवा करता
है। देश को युवा आगे बढ़ाता है इस लिए युवा उत्तर प्रदेश के चुनाव महोत्सव में
जुटें और परिवर्तन कर हम सबका सहयोग करें।'
तो साहिबान अब आप साफ़ समझ लें कि अमित शाह उत्तर प्रदेश में होने जा रहा उनका
 'चुनाव महोत्सव'  किसके बूते सफल बनाना चाहते हैं। ऐसा नहीं कि भाजपा अध्यक्ष
किसी किस्म के भुलावे में हैं। उनका अपना लक्ष्य कम से कम उनके सामने बहुत साफ़
है।और वो दरहक़ीक़त वही कह रहे हैं जो ज्यादातर युवा राजनेताओं के मुहँ से सुनना
चाहते हैं। नौजवान स्वभावतः आदर्शवादी होता है। और यू पी का नौजवान
मतदाता 'पॉलिटिक्स ऑफ परफोर्मेंस' ही चाहता है। मगर जब भाजपा अध्यक्ष
या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साहब ऐसे जुमले उछालते हैं तो हम युवाओं को
बड़ी कोफ़्त होती है।
क्योंकि, ये जुमले उस वक्त उछाले जा रहे हैं जब लगभग ढाई साल से दिल्ली की
गद्दी संभाले नरेन्द्र मोदी जी के राज में युवाओं के लिए नौकरियों का अकाल पड़ा
हुआ है। हर साल करोड़ों युवाओं को नौकरियां देने का वादा कर सत्ता में आयी
भाजपा ने प्रचार के लिए तो खूब योजनाए चला रखी हैं। मगर जमीनी हकीकत ये है कि
नौकरियों के उत्पादन का आँकड़ा सात साल में सबसे नीचे के स्तर पर जा पहुंचा है।
हालात ऐसे हैं कि अभी दो चार दिन पहले ख़ुद राष्ट्रपति महोदय को इस मुद्दे पर
सरकार और शिक्षण संस्थानों के प्रमुखों का ध्यान खींचना पड़ा है।
वैसे राष्ट्रपति महोदय तो विश्वविद्यालय और संस्थानों में घटती सहिष्णुता को
भी खतरनाक समझते है। हालाँकि, एच सी यू से लेकर जे एन यू तक छात्र नौजवानो की
आवाज को कुचल कर रख देने के काम में संघ-भाजपा और उसके दूसरे संगठन रात दिन एक
किये हुए हैं।
ऐसे विकट समय में महज़  'पॉलिटिक्स ऑफ परफोर्मेंस' का जुमला उछाल कर यदि भाजपा
के नेता युवाओं को भरमाना चाहते हैं, और यू पी की चुनावी लड़ाई में मोहरे की
तरह हमारा इस्तेमाल करने के भुलावे में हैं, तो उन्हें यह बात भी समझ लेनी
चाहिए कि उनकी यह कोशिश अबकी कामयाब होने वाली नहीं है।


*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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