[दीवान]इन मौतों के लिए आख़िर कौन जिम्मेवार है ?
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Wed Nov 23 09:09:46 CST 2016
प्रधान मंत्री द्वारा नोट बदली की घोषणा के बाद से कई तरह की
बातें लगातार सुनने को मिल रही हैं। बड़े जोरों की एक अफ़वाह यह भी है कि लंबे
समय में इस फैसले के कुछ अच्छे प्रभाव भी हमें अवश्य देखने में आएंगे।
हालाँकि इस बात का जवाब अब तक किसी समर्थक के पास नहीं है कि कुल कितना काला
धन पाँच सौ और हजार रूपये के रद्द किये गए नोटो की शक्ल में है/था?
बस एक मोटा अनुमान ये है कि भारत में मौजूद काले धन का लगभग ६% हिस्सा इन
नोटों के रूप में भी अस्तित्वमान रहा है। अब उस १४ लाख करोड़ रूपये मूल्य की
प्रचलित कुल नकदी, जिसे रद्दोबदल से गुजरना है, में इस काले धन का कितना
हिस्सा है, यह बड़े-बड़े विशेषज्ञों को भी मालूम नहीं ! फिर भी, काले धन, जाली
मुद्रा और भ्रष्टाचार से लड़ने का शिगूफा छोड़ते हुए, नरेन्द्र मोदी साहब ने
बिना उपयुक्त तैयारी किये पूरे देश की आम आवाम को लाइन में खड़ा कर अपनी
सारी स्याह-सफ़ेद माल-ओ-दौलत का हिसाब पेश करने का एक तुग़लकी फरमान जारी कर
दिया है।
इस तुग़लक़ी फैसले को अगर नरेन्द्र मोदी के आलोचकों ने 'आर्थिक आपातकाल' की
संज्ञा दी है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। क्योंकि भ्रष्टाचार और काले धन
की उत्पादक व्यवस्था पर चोट करने में पूरी तरह से असमर्थ उनका यह फ़रमान कई लाख
करोड़ रूपये के कारोबारी नुकसान की सीधी वजह बनने के अलावा अब तक अलग-अलग
मामलों में ७० के आसपास जानें भी ले चुका हैं।
प्रधानमंत्री के इस फैसले को उनकी पार्टी ने एकदम सही ठहराते हुए उसके बचाव
में पूरी मजबूती से खड़े दिखने की एक आक्रामक रणनीति अपनायी है। दूसरी ओर बहती
गंगा में हाँथ धोने को आतुर रामदेव बाबा जैसे लोग इस फैसले के विरोधियों पर
'राष्ट्र विरोधी' होने का लेबल चस्पा करने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं।
वहीँ इस मुश्किल फैसले से मेहनतकश आवाम की परेशानियों में कुछ वैसा ही इज़ाफ़ा
हुआ है जैसा अक्सर 'कोढ़ में खाज' से हो जाया करता है। यहाँ कश्मीर से आई
एक रपट पर आप सब का ध्यान इस सवाल के साथ चाहता हूँ कि आख़िर इन मौतों के
लिए कौन जिम्मेवार है?
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*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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