[दीवान]अब तो डर ये है कि कहीं संसद में ही न चल जाएँ जूते

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Fri Nov 25 08:04:58 CST 2016


दोस्तों,
आप सब यह जानते हैं कि जवाब से ज्यादा मेरी दिलचस्पी का विषय सवाल हुआ करते
हैं। इसी लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा हजार और पाँच सौ रूपये के नोटों की बदली के
फैसले की घोषणा के बाद से जब मैंने इस को ले कर उठ रहे सवालों पर अपना ध्यान
केंद्रित किया, तो मुझे इससे जुड़ा एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल प्रकाश
अम्बेडकर साहब का लगा। प्रकाश अम्बेडकर ने आज से लगभग दसेक दिन पहले ही यह
गंभीर सवाल उठाया था कि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ- जो न तो एक पंजीकृत
यानी रजिस्टर्ड संस्था है, और न जिसके खाते बही का कोई हिसाब किताब- अपने
नोटों की बदली आखिर कैसे कर रहा है? आर.एस.एस के लोगों ने प्रकाश
अम्बेडकर के इस महत्वपूर्ण सवाल पर चुप्पी साध ली कि दान में मिले नोटों को वो
आखिर 'कैसे' बदलेंगे? या कि उन्हें इसकी चिंता नहीं क्योंकि उन्होंने पहले से
ही अपने अथाह पैसे को ठिकाने लगा दिया है।

बहरहाल, नोट बदली की घोषणा के बाद से बीजेपी की यही कोशिश रही कि देश के समक्ष
अपने इस फैसले को काले धन के खिलाफ लड़ाई में एक ईमानदार कदम के रूप में पेश
करते हुए इस पर किसी तरह का सवाल उठाने वाले विरोधियों को बेईमान, भ्रष्टाचारी
और काला धन समर्थक प्रचारित किया जाय। हालाँकि, शुरुआत से ही इस फैसले को लागू
करने के तरीके और अपने आप में इसके नाक़ाफी होने जैसी बात कहते हुए तमाम लोगों
ने मोदी सरकार के इस त्वरित फैसले पर सवाल खड़े किये हैं।

कुछ ऐसी भी खबरे लगातार आयीं हैं जिससे मोदी सरकार की ईमानदारी और नेकनीयत पर
शंका की गुंजाईश भी बनी है। ऐसी ही एक खबर पश्चिम बंगाल की बीजेपी यूनिट के
अपने इस दूरगामी फैसले की प्रधानमंत्री द्वारा घोषणा से थोड़ा ही पहले करोड़ों
रूपये मूल्य के नोटों को बैंक खाते में जमा करवाने का मामला भी रहा। पश्चिम
बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने जिसका खुलासा किया। और तभी से यह
मामला सुर्ख़ियों में भी है।

अब ताजा घटनाक्रम पर नजर डालें तो आज की तारीख में दो बड़े चौकाने वाले खुलासे
हुए हैं। पहला ये कि डी डी न्यूज़ से संबद्ध एक मीडियाकर्मी ने प्रधानमंत्री के
आठ नवम्बर को राष्ट्र के नाम प्रसारित संबोधन को 'रिकार्डेड' या 'डिफर्रेड
लाइव' बताते हुए नोट बदली के इस फैसले की 'गोपनीयता' से जुड़ा एक और सवाल उठाया
है। साथ ही कैच न्यूज़ की ओर से हुए खुलासे में फैसले की घोषणा से ठीक पहले
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की देख रेख में पार्टी द्वारा देश के तमाम शहरों में
बड़े पैमाने पर महंगे दरों की जमीने खरीदने का मामला भी सामने आया है। अब यह
सवाल तो उठेगा ही कि क्या बीजेपी और आरएसएस के लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से
अपने पास पड़े (काले) धन को फैसले की सार्वजनिक घोषणा से पहले ही ठीकाने लगा
दिया? ऐसे सवालों के बीच सबसे बड़े विपक्षी दल के बतौर कांग्रेस की भूमिका बड़ी
महत्वपूर्ण हो जाती है। कल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस फैसले को
संसद में 'संगठित' और 'कानूनी लूट' बताना कांग्रेस के हमलावर रूख का ही पता
देता है। फिर राहुल गाँधी ने भी आज मोदी जी को संसद में अपने जज्बात दिखाने की
चुनौती दे दी है। मगर मैं तो इस सारे घटनाक्रम को देखते हुए बड़ा चिंतित मह्सूस
कर हूँ। वजह ये कि नोट बदली से जुड़े जैसे जैसे घोटाले अब सामने आ रहे हैं,
उसके बाद कहीं संसद में ही हमारे कर्मठ प्रधानमंत्री जी को गोपनीयता भंग करने
और लोगों के जज्बातों से खेलने के एवज में उग्र सांसदों के जूतों का सामना न
करना पड़ जाए!


*A nation's treasure is its scholars. --- Yiddish proverb*
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