[दीवान]खुद से किए वायदे का टूटना
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Oct 9 02:38:26 CDT 2016
आज अपने "एक्स मेंटॉर" के एक लेख पर नजर गई. उन्होंने मार्शल मैक्लूहान की
किताब की चर्चा करते हुए किताब का नाम के बदले उसमे शामिल एक अध्याय का शीर्षक
शामिल किया हुआ है. हालांकि ये अध्याय अपने आप में इतना लोकप्रिय है कि मीडिया
की हर दूसरी-तीसरी किताब में एक वाक्य के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.
खैर,
मैंने तय किया था कि कभी किसी बात के लिए उन्हें फोन या मैसेज नहीं करूंगा.
एक्स के प्रति एक अलग किस्म की ईमानदारी बरतनी पड़ती है. लेकिन रहा नहीं गया.
जिस किताब के बारे में पहली बार उनसे ही सुना और कई सीढ़ियां चढ़ने के बाद मूल
किताब हाथ में आई, उसका नाम उनके ही लेख में गलत हो.. लिहाजा,
किताब का सही नाम मैसेज कर दिया. ऐसा करके हमारा खुद से किया वादा टूट गया
लेकिन वो ट्रेनिंग जो कि उनकी ही दी हुई है, लगा मजबूत ही हुई- लिखने-पढ़ने की
दुनिया में वैचारिक असहमति के बावजूद ज्ञान की सत्ता को बचाए रखने की पूरी
कोशिश की जानी चाहिए. यही सारी बातें तब से दिमाग में आती-जाती रही और ऐसा
करके अफसोस नहीं हुआ. लगा हमने अच्छा ही किया.
इस किताब का नाम पहली बार उनके ही मुंह से सुना था. पहले कुछ हिस्सा फोटो कॉपी
कराई थी, उसके बाद हमारे बेहद प्यारे सीनियर अवनीश सर ( Awanish Mishra
<https://www.facebook.com/awanish.mishra>) ने पूरी किताब की फोटोकॉपी हमेशा
के लिए दे दी. बाद में मुझे जब फेलोशिप के पैसे मिलने लगे तो पहली ही खेप में
मैक्लूहान, एडोर्नो, देरिदा, फूकोयामा सबकी किताबें खरीदी. इन किताबों और
विद्वान से मेरा पहला परिचय मेरे एक्स मेंटॉर ने ही कराया था.
लेख में जब किताब का नाम के बदले शीर्षक का नाम देखा तो सोचने लग गया- हम जिस
किताब को, जिस चीज को और जिस शख्स को बहुत प्यार करते हैं, दिन-रात उनकी चर्चा
करते हैं, एक समय बाद वो अतिपरिचय ( डिफैमिलिएशन) के शिकार हो जाते हैं. उसका
काफी कुछ याद रह जाता है लेकिन वो खुद नहीं.
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