[दीवान]्ऑफस्क्रीन मुंबईः जो हिन्दी सिनेमा के जिंदा म्यूजियम हैं
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Oct 12 15:14:58 CDT 2016
इनके पास 1870 ई. का कैमरा है. दो हजार किलो के जब प्रोजेक्टर हुआ करते थे, वो
है. मिट्टी तेल से जब प्रोजेक्टर चला करते थे, वो भी है. जब कांच पर 35 एमएम
की तस्वीरें छपकर आया करतीं थी, वो सैंकड़ों की संख्या में है. डेढ़ सौ से भी
ज्यादा पुरानी घड़ियां हैं.
हिन्दी सिनेमा की हजारों लॉबी कॉर्ड है. मदर इंडिया की क्लासिक्ल पोस्टर है,
वो तो फिर भी किसी के पास मिल जाए लेकिन इनके पास वो पोस्टर है जिस पर कलाकार
ने बनाने से पहले चौकोर लाइनें खींची थी. फिलिप्स की वो रेडियो है जब भारत में
रेडियो क्लब के तहत रेडियो की शुरुआत हुई थी. यानी 1925-30 के आसपास की. सौ-सौ
साल पुरानी लैम्प है. सवा सौ साल पुरानी संदूकें हैं. हजारों की संख्या में उन
फिल्मों के ऑरिजिनल फोटोग्राफ्स हैं जो अब शायद कपूर, खान, बच्चन खानदान में
भी न हो. मुगल-ए-आजम की शूटिंग के दौरान की तस्वीरें हैं. गुलजार की ब्लैक एंड
व्हाइट वो तस्वीरें हैं जब वो खुद कैमरे से शूट किया करते थे.
हजारों साउंड प्लेट्स हैं. उस समय के फिल्मों के पोस्टर हैं जब वो टिन पर
प्रिंट हुआ करती थीं. डेढ-डेढ सौ साल पुराने ट्रायपॉड हैं. लेकिन
पिछले अठारह साल की जिस कड़ी मेहनत और दिन-रात एक करके ये सारी चीजें उन्होंने
जुटाई हैं और जान लगाकर सहेजने का काम करते आए हैं, हमें अच्छा नहीं लगा कि
घंटे-डेढ़ घंटे की मुलाकात में उनकी तस्वीर उतार ली जाए. ऐसा करने की हिम्मत
ही नहीं हुई और बिना इजाजत ऐसी जगहों की तस्वीरे लेनी ही नहीं चाहिए.
अजय सर ( Ajay Brahmatmaj <https://www.facebook.com/brahmatmajay>) ने जब कहा
कि मैं आपको जुबानी बता नहीं सकता वहां जाने के बाद आप कैसा महसूस करेंगे, आप
पहले खुद चलकर देखिए.
मुझे लाइब्रेरी, आर्काईव की खुशबू अच्छी लगती है. कई लोगों को वो शायद
बर्दाश्त भी न हो. लेकिन राजीव खंडेलवाल स्टूडियो और अर्काईव में घुसते ही
वैसी ही खुशबू आ रही थी. समझते देर न लगी कि यहां जो होगा, वो सच में जुदा हो
गया.
शुरू में उन्होंने चीजें बताने में थोड़ा संकोच किया लेकिन मेरी दिलचस्पी,
चेहरे के हाव-भाव और साउंड और सिलिंडर संस्कृति पर थोड़ा-बहुत मेरी बात सुनने
के बाद खुलते चले गए और उसके बाद जो दिखाना-बताना शुरू किया तो लगा हम अपने
मौजूदा दौर से सौ-सवा साल पीछे आ गए हों. गौरवशाली अतीत क्या होता है, वो सीधे
तौर पर महसूस कर पा रहा था.
हम डेढ़ घंटे से ज्यादा तक उनकी बात सुनते रहे, चीजें देखते रहे. और रूकने का
मन था लेकिन फिल्म शो के लिए हम लेट हो जा रहे थे. चलते-चलते मैंने उनसे बस
इतना कहा- अगली बार मैं छुट्टी लेकर मुंबई आता हूं तो आप मुझे अपना इन्टर्न रख
लेंगे ?
इन जगहों पर जाने के बाद जानकारी के मामले में मैं अपने को बेहद बौना पाता
हूं..लगता है, कितना कम जानते हैं हम. कितना कुछ है दुनिया में जानने के लिए.
लेकिन फायदा ये होता है कि हम एक बार फिर पढ़ने-लिखने की दुनिया पर यकीन करने
लग जाते हैं जैसा सुबह अपने टीचर का लेख पढ़कर दोहराया था.
मुझे नहीं पता कि मुंबई के अखबारों,पत्रिकाओं में इनके काम की कितनी चर्चा
होती है लेकिन उनसे बात करते हुए महसूस कर रहा था कि इस देश में गर्व करने
जैसी कितनी चीजें, कितने लोग हैं और हम इतिहास के नाम पर बिना जाने-समझे पता
नहीं किन-किन चीजों पर गर्व करने का पाखंड करने लग जाते हैं.
#ऑफस्क्रीनमुंबई
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[image: Vineet Kumar's photo.]
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