[दीवान]जो सोनू निगम के लिए शोर है, स्नेहा के लिए संगीत हैः

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Apr 17 12:52:30 CDT 2017


ओटो की भड़भड़, गन्ने से रस निकालनेवाली मशीन, ट्रैक्टर की ढें-ढें-ढें-ढें,
मुनादी का लाउड स्पीकर, चलती साईकिल की आवाज...ये सबके सब हमारे-आपके और सोनू
निगम के लिए शोर है. ऐसा शोर की कई बार हम लड़ पड़ते हैं लेकिन स्नेहा के लिए
ये सब संगीत है. एक आदिम आवाज जिसमे वो श्रम की धुन, पसीने की तान और निरंतरता
की लय खोज लेती है.

एमटीवी पर प्रसारित स्नेहा खनवलर को शो "साउंड ट्रिपन"के एक-एक एपीसोड को बहुत
गौर से देखा है. कार्यक्रम शुरु होते वक्त इन सबकी आवाज इतनी कर्कश लगती कि आप
में से कुछ लोग टीवी तक बंद कर दें. लेकिन यही शोर धीरे-धीरे स्नेहा का साथ
पाकर एक खूबसूरत धुन में तब्दील हो जाया करती. आखिर-आखिर तक आपको स्नेहा के
प्रति गहरा सम्मान तो पनपता ही, इन शोर के प्रति भी एक खास किस्म का लगाव पैदा
होने लग जाता.
अब आप ऑटोवाले को गुजरते देखते तो आवाज पर गुस्सा करने के बजाय उसमे मेहनत की
धुन तलाशने लग जाते. उसकी गति से उसका मिजाज भांपने की कोशिश करते. टुंग-टुंग
वीडियो लिंक पर क्लिक करके देखिएगा, आप इस एहसास से गुजर सकेंगे.

एक कलाकार काम सिर्फ सुंदर रचना नहीं होता है बल्कि जो दुनिया के लिए बदसूरत
है, कबाड़ है, शोर है, उनमें छिपी सुंदरता और संभावना को उद्घाटित करना भी
होता है. नागार्जुन की कविता की पंक्तियां याद कीजिए "कई दिनों तक चूल्हा
रोया, चक्की रही उदास", रेणु के मैला आंचल की भूमिका याद कीजिए "यहां धूल भी
है, शूल भी है..ये है मेरीगंज"..साहित्य में आपको ऐसी हजारों हजार पंक्तियां
मिल जाएंगी जो विद्रूपताओं और क्रूर परिस्थितियों में उस सुंदरता और संभावना
को खोज लेती है जिसे कि एक खांचे में जीनेवाला समाज नंजरअंदाज कर चुका होता है.

इस लिहाज से सोचिए तो सोनू निगम बेहतरीन गायक होते हुए भी सामाजिकता के स्तर
पर स्नेहा खनवलरकर से कितने पीछे हैं ? मस्जिद से आनेवाली अजान की आवाज को
लेकर आज जब उनके विचार से गुजरा तो गहरे अफसोस से भर गया. थोड़े वक्त के लिए
छोड़ दीजिए कि ये एक खास धर्म के लोगों की ओर से किया जानेवाला शोर( हालांकि
मैं मस्जिद और मंदिर से आती आवाज को सोनू निगम से बिल्कुल अलग देखता हूं, कभी
विस्तार से लिखूंगा इस पर) है. लेकिन एक गायक की रचनात्मकता, उसकी कल्पनाशीलता
कितनी भोथरी है कि वो इसमे संगीत की कोई संभावना नहीं देख पाता.
ये बहुत संभव है कि सोनू निगम ने जिस अंदाज में अपनी बात कही है, समाज का एक
तबका उन्हें सिर आंखों पर बिठा लेगा लेकिन एक गायक-कलाकार के तौर पर उनकी
दुनिया कितनी कम दूरी पर जाकर सिमट जाती है, इसका अंदाजा हम सब लगा ले रहे हैं.

मेरी दिलचस्पी सोनू निगम सहित देश के तमाम गायकों के बारे में ये भी जानने की
है कि जब वो रियाज कर रहे होते हैं और किसी न किसी तरह से बीच में बच्चे खेलने
लग जाते होंगे, शोर करते होंगे तो उन्हें उस वक्त जेहन में क्या आता होगा ? ये
सवाल इसलिए कि कई बार मैंने कलाकारों-साहित्यकारों को गौर से देखा है कि शांति
के नाम पर उन्हें छुआछूत के स्तर पर एकांत चाहिए होता है.

दिल्ली जैसे शहर में रहते हुए हम सब शोर से त्रस्त होते हैं. ऐसे दौर में जहां
खड़े-खड़े इंसान तक को उसके भीतर का विवेक निचोड़कर शोर में तब्दील कर दिया जा
रहा हो. मुख्यधारा मीडिया को इसमे गहरी दिलचस्पी भी है. ऐसे में अजान,हनुमान
चालीसा पाठ के शोर की बात तो बहुत पीछे छूट जाती है. असल सवाल तो यहां से शुरु
होता है कि हम बाहर-भीतर दोनों के शोर से गुजरते हुए रचनात्मक, संवेदनशील या
संभावनाओं के बीच रह पाते भी हैं या नहीं. ऐसा इसलिए भी कि सालों से एकाकीपन
के बीच कई बार आधी रात में पानी मोटर के चलने की आवाज, हवा को काटते हुए पंखे
की आवाज, घड़ी की टिक-टिक किसी के साथ होने का एहसास कराती है. हम किस-किस तरह
के शोर के बीच जी रहे होते हैं, ये इस सवाल के साथ जुड़ा है कि हम किस-किस को
बर्दाश्त कर पाते हैं, लगाव पैदा कर पाते हैं, उनमे मेहनत,पसीने और संघर्ष की
लय-धुन महसूस कर पाते हैं.
टिंग-टिंग की लिंक- https://www.youtube.com/watch?v=EcdVnlK7Mw0
<https://l.facebook.com/l.php?u=https%3A%2F%2Fwww.youtube.com%2Fwatch%3Fv%3DEcdVnlK7Mw0&h=ATOijxCNzKGQ88l0q4o1jwMHAIbLwhNh5Dfg8nJjF9ep9AEjHDOa3cW1mp4UA2w5Uzd84h5hxlG50kRaeJhlroC-pcT09uZ3k37jkoW4NiwJ1ZJFUxaTKRDVRkg4yFmsmVAWTM7jaNZXaUshrA&enc=AZOLAW9SR5TpuDSFi7Mw_cCCcjCyVHGmURi69uOcmNxelwX9paMoxYdKoS5ihFC05uOorWzGovXIrsUrcZtZu4mQyO5lHFn6DuXG31Uxv6fyRiozcmCwCdocq6SHFcx-Ffxbvcr_OMCrkqf_-3UGDPkVY360ULIozg9oOOeLnm7553gf-g1L1xO8JyRos8AsQCY&s=1>
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