[दीवान]एनडीटीवी को चाहिए कि

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Apr 24 11:50:25 CDT 2017


दोहरी जिम्मेदारी तो हमारे उपर तो है. सुबह आठ बजे से शाम के आठ बजे तक ऑटो
चलाती हूं. उसके बाद घर देखना होता है. लेकिन मजा आता है. हमको लगता है कि हम
अपने दम पर जिंदगी जी रहे हैं. एक औरत का अपना भी स्वतंत्र जीवन होता है

पटना की सड़कों पर सुष्मिता ऑटो चला रही होती है और पीछे सवारी की सीट पर
बैठकर उमाशंकर सिंह एक के बाद एक दनादन सवाल कर रहे होते हैं.
सुष्मिता जिस सुलझी-सरल भाषा में सवालों के जवाब दे रही होती है, उतनी साफ समझ
कई बार स्त्री विमर्श की कक्षाओं में प्रोफेसर तक नहीं दे पाते. सुष्मिता के
आगे सबकुछ जैसे आईने की तरह है..कहीं कोई भटकाव नहीं, उलझन नहीं. एनडीटीवी को
चाहिए कि सुष्मिता के जवाबों को ट्रांसक्रिप्ट करके अलग से एक पोस्ट वेबसाइट
पर लगाए. यह पाठ देश के हजारों झेल-थकाउ विमर्शकारों के लिए लाभकारी तो होगा
ही, साथ ही ये समझने में भी मदद मिलेगी कि संदर्भजनित लेख न लिखकर भी कोई
स्त्री-पक्ष को कैसे मजबूत कर रहा है.

आगे उमाशंकर से सवालों का जवाब देने के क्रम में वो कहती हैं- एयरपोर्ट की तरफ
से जब मैं सवारी लेकर निकलती हूं तो पुरुष लोग गर्व से देखते हैं. उन्हें लगता
है कि महिला होकर हम ऑटो चला रहे हैं. लेकिन कई पुरुष लोग जलन में ऑटो का सीट
फाड देता है, सीसा तोड़ देता है, परेशान करता है. मुख्यमंत्री को चाहिए कि हम
महिला ऑटो चालक के लिए अलग से स्टैंड बनवाएं.

सुष्मिता की पूरी बातचीत में पुरुषों से शिकायत है लेकिन दूसरी तरफ उन पुरुषों
के प्रति सम्मान का भी भाव है जो उनके काम में अपनी प्रगतिशीलता देखते हैं.
सुष्मिता से ये बात सीखने की जरुरत है कि हम किसी गलत बात का प्रतिरोध करते
हुए किसी वर्ग, जाति, समुदाय के प्रति जो सपाट समझ बनाने लग जाते हैं और सिरे
से उन्हें नकार देते हैं, संतुलित होकर सोचने की जरुरत होती है. ये सोच समाज
को सच्चे अर्थों में विकास की ओर ले जाती है.
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