[Deewan] NM se, 03
"सीएम लैब, नांगला माँछी"
nangla at cm.sarai.net
Sun Feb 5 22:34:34 IST 2006
शनिवार
-जानू-
तमन्ना की नींद टूटी। वो अपने
हसीन बेड से लिपटे बिस्तर को
छोड़कर जागती हुई, अपनी पलकों
को धीरे-धीरे खोलती हुई, शरीर
को टाइट करते हुए उठी। बिस्तर
को ओढ़े हुए हल्के गुलाबी रंग
के पर्दे को हटा कर उसने
दरवाज़ा खोला और सामने लगे
दर्पण में देखा। अपना चेहरा
देखते हुए, बालों पर हाथ मारा
और यकायक कुछ सोच कर उस के
चेहरे पर हल्की सी मुस्कान
खिलखिलाई। वो मुड़ी और साहिल
के बिस्तर के पास गई, उस के
सिरहाने पर बैठ गई। चादर के
नीचे से साहिल का चेहरा झांक
रहा था - आँखें बंद, किसी गहरे
सपने में खोई हुईं एकदम शांत
लग रहीं थीं। बाल तकिये से
चिपके हुए बिखरे-बिखरे हो रहे
थे। तमन्ना ने चादर थोड़ी
नीचे सरकाई और उस के गाल पर एक
हल्का सा किस दिया। तो साहिल
ने थोड़ा हिलते हुए अपनी
बाहें फैलाईं और तमन्ना के
गले में डाल दीं। तमन्ना ने
अपनी मुलायम हथेली से उस के
हाथ को सहलाया, और आँखें
मटकाते हुए, कमर के झटके के
साथ उठी और बिस्तर से दूर हट
गई। उस के दूर होते ही साहिल
ने बनावटी रूठने की "ह्म्म्म"
की आवाज़ निकाल कर चादर खींच
कर अपना चेहरा ढक लिया।
फिर क्या, रोज़ की तरह तमन्ना
घर से निकल कर, दरवाज़ा बंद
करते हुए पुश्ते पर बने
शौचालय की तरफ़ चल दी। वो रोज़
सुबह जल्दी ही जाती, वहाँ भीड़
लगने से पहले। वहाँ उसी की तरह
एक-दो औरतें उसे दिखतीं, जो
प्लास्टिक के गिलास में पानी
भर के उसी के साथ अलग-अलग
डब्बा रूपी शौचालयों में
दाख़िल हो जातीं। फिर बाहर
निकल के, वहीं बने नल और साथ
में रखे साबुन से हाथ-मुँह
धोतीं, और शौचालय की देखभाल
करती औरत को एक रुपया दे कर
अपने घरों की तरफ़ रवाना हो
जातीं।
तमन्ना भी अब घर की तरफ़ चल
दी। अब तक कुछ और औरतें और
आदमी भी नज़र आने लगे थे। सब
बोतलें या डिब्बे लिये हुए
थे। कुछ तो उसी शौचालय की
तरफ़, और कुछ यमुना के मैदान
की तरफ़ जा रहे थे। सभी रात
में जिस में सोते हैं, उन्हीं
कपड़ों में थे, या फिर कुछ पहन
कर अपनी शरीर को ढाँक लिया था।
आदमियों में किसी ने तो
सिर्फ़ तहमक ही लपेटी हुई थी,
तो कोई-कोई निकर और बनियान, और
पैरों में रूपानी चप्पल पहने
नज़र आ रहे थे। सभी के बाल सो
कर अभी उठे होने से अलग-अलग
आकार लिये हुए थे। तमन्ना ने
मन में सोचा, मज़ा आए अगर किसी
दिन रुक कर बालों के आकार के
हिसाब से सब को नाम दूँ! पर अभी
तो वो रुकी नहीं। उसे घर जा कर
खाना बनाना है, पति को गर्म
चाय दे कर उठाना है और बच्चों
को स्कूल भेजना है। ये सोच कर
तमन्ना जल्दी-जल्दी क़दम
बढ़ाते हुए वापस घर की तरफ़ हो
ली।
सवेरा होने से पहले
“जानू"
01
सूरज अभी नहीं निकला है।
बसेरे में धुएँ की धुँध नज़र आ
रही है। पुश्ता पर कई लोगों के
घरों पर चूल्हा जल रहा है। लोग
अपने चूल्हों के पास बैठ कर
चाय की चुस्कियाँ लगा रहे
हैं। ये चूल्हे कमरों के अंदर
नहीं बल्कि बाहर ही हैं - सड़क
के साथ ही चूल्हा है, और यही
रसोईघर है। जब लोग गुज़रते
हैं तो इसे छूते नहीं, बस
देखते हुए निकल जाते हैं।
एक महिला रोटी बना रही है। वो
गुँधे आटे की थाली सड़क पर ही
रख देती है और खाना बनाने लगती
है। उस के पीछे दरवाज़ा है,
जिस पर पर्दा नहीं है। जब रसोई
ही सड़क पर है, तो पर्दा कैसा।
सर्दी का मौसम है। उस ने एक
कनस्तर में पानी भर के चूल्हे
पर चढ़ा दिया है। हल्की आँच पर
पानी गर्म हो रहा है। कनस्तर
के बगल में एक छ:-सात साल का
लड़का बैठ कर लकड़ियों को
हिलाता जा रहा है जिस से आग की
लपट और तेज़ हो रही है। वो
बराबर पानी को छू कर देखता जा
रहा है कि कितना गर्म है। फिर
वो आवाज़ लगाता है, “मम्मी,
पानी गर्म हो गया।" तो वो औरत
अंदर से आ कर पानी को पलट कर ले
जाती है, और कनस्तर को दोबारा
पानी से भर देती है।
वहीं गली से लोग गुज़र रहे
हैं। पर गलियाँ सिर्फ़
निकलने के लिये नहीं हैं, वहाँ
कुछ लोग अपने पैरों से चादर को
टाइट कर कर ओढ़ के सो रहे हैं।
कुछ लोगों का तो सोने का समय
ही सुबह में होता है। लोग उन
से कटते हुए अपने रास्ते पर
निकल जाते हैं।
02
एक लड़का, जिस की उम्र पंद्रह
से सोलह साल है, जो सुबह की
पहली किरण दो सौ से चार सौ
रुपये कमा कर ही देखता है। वो
अपने बालों को हमेशा लंबा
रखता है। उस के कंधे पर हमेशा
एक झोली रहती है। उस का रंग
सांवला है और वो मुँह में हर
वक़्त दिलबाग चबाता रहता है।
वो हमेशा उन जगहों पर जाता है
जहाँ शायद जाने से सब कतराते
हैं। ये ज़मीन से पैसा उठाता
है, लेकिन जिसे उठाने को कोई
राज़ी नहीं होगा। वो अपने
शरीर को झुका कर काम की कोई भी
चीज़ उठाता है और अपनी झोली
में भर लेता है।
उसके पीछे कुत्ते-सुअर घूमते
रहते हैं, पर वो निडर हो कर
नांगला के आसपास कूड़ा
फेंकने के स्थानों पर घूमता
है। जहाँ उसे कुछ मिल जाए –
प्लास्टिक की बोतल, काग़ज़ का
टुकड़ा - वो उसे हाथ से या लोहे
की तार से उठा कर बीनता फिरता
है। एक डंडे के नीचे चुंबक लगा
कर वो नांगला में बनी नालियों
में डाल कर चलता निकल जाता है,
और जो कुछ उस से चिपकता है उसे
अपने तसले में जमा करता रहता
है।
सूरज निकलने से पहले वो अपना
काम पूरा कर के किसी दुकान पर
सभी लोगों के साथ चाय पीता है
और सूरज ने के साथ साथ वो भी
निकल जाता है।
सीएम लैब, नांगला माँछी
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प्यासों की प्यास बुझाता है
नांगला,
दिल्ली में आने वालों का
बसेरा है नांगला।
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