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Rajeev Ranjan Giri rajeev.ranjan.giri at gmail.com
Mon Feb 8 05:25:31 CST 2016


स्वराज की राह पर

राजीव रंजन गिरि

1915 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे। उनके राजनीतिक गुरु
गोपालकृष्ण गोखले ने सुझाव दिया कि भारत आकर शीघ्रता में कोई काम शुरू न करें।
पहले भारत-भ्रमण करें।मुल्क की मनोभूमि पढ़ें। उसके बाद सार्वजनिक सवालों पर,
खासकर राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के बारे में, अपनी राय बनाएँ और अपने आगामी
कार्यकलापों की रणनीति भी। गुरु के परामर्शानुसार गांधीजी देश के विभिन्न
हिस्सों में गए। कई जगह उनके सम्मान में आयोजन हुए।लोगों से संवाद किया।
महात्मा मुंशीराम, जो स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से लोकप्रिय हैं और कविगुरु
रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी मिले। 31 मार्च 1915 को गांधी जी कोलकाता स्थित कॉलेज
स्कवेयर के विद्यार्थी भवन में, पी.सी. लायन्स की सदारत में आयोजित एक बड़ी
सभा में भाषण के दौरान, अपने गुरु के ‘आदेश’ का स्मरण करते हुए कहा कि मैं इस
सभा में भाषण देने का लोभ संवरण नहीं कर सका।
    महामना मदनमोहन मालवीय के निमन्त्रण पर गांधीजी बनारस पहुँचे। काशी नागरी
प्रचारिणी सभा के बाइसवें वार्षिकोत्सव में भी शामिल हुए। काश्मीर के
महाराजाधिराज के सभापतित्व में सम्पन्न इस समारोह में गांधी जी ने भारतीय
भाषाओं की असीम उन्नति की जरूरत पर बल दिया। युवकों से हिन्दी में
पत्र-व्यवहार करने का आग्रह किया। 4 फरवरी 1916 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
का उद्घाटन हुआ। कार्यक्रम में वायसराय भी शामिल हुए थे। दरभंगा के राजा सर
रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में सम्पन्न समारोह में मालवीय जी के ‘विशेष
आग्रह’ पर गांधीजी ने भाषण दिया।
   साल भर के देश-भ्रमण के दरम्यान गांधीजी ने जो मौन रखा था वह ऋषियों की
समाधिस्थ मौन नहीं था, जिसमें एक जगह बैठकर अंतप्रज्ञा का अभिज्ञान किया जाता
है। गांधी ने इस कालखण्ड में खूब यात्राएँ की। हर क्षेत्र के लोगों से मिले।
साहित्य, राजनीति, धर्म, अध्यात्म, समाज सुधार जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में
काम कर रहे सचेत लोगों के साथ चर्चाएँ की। उनके विचारों को जाना, सुना और गुना।
       यह भाषण इस मायने में भी ऐतिहासिक महत्त्व का था कि इसमें गांधीजी ने
अपनी धारणा मजबूती के साथ जाहिर की।इसमें स्वराज आंदोलन की प्रकृति की समीक्षा
की गयी थी  और संघर्ष की नई संस्कृति की प्रस्तावना भी।   मंच पर मौजूद एनी
बेसेंट और अध्यक्षता कर रहे दरभंगा राजा रामेश्वर सिंह सहित गणमान्यों को
गांधीजी की बातें आपत्तिजनक महसूस हुई। महामना मदनमोहन मालवीय को छोड़ सभी मंच
से चले गए. नतीजतन गांधीजी का भाषण अधूरा रह गया।
>>       गांधीजी ने कहा कि इस पवित्र नगर में, महान विद्यापीठ के प्रांगण
में, अपने देशवासियों से एक विदेशी भाषा में बोलना शर्म की बात है। आशा प्रगट
की कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के
माध्यम से शिक्षा देने का प्रबन्ध किया जाएगा। गांधीजी ने वहाँ मौजूद लोगों से
सवाल किया कि क्या कोई स्वप्न में भी यह सोच सकता है कि अँगरेजी भविष्य में
किसी भी दिन भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है? श्रोताओं ने ‘नहीं, नहीं’ कहकर
जवाब दिया। उन्होंने भारत की ख्याति का कारण आध्यात्मिकता को बताया। यह कहा कि
बातें बघार कर आध्यात्मिकता का संदेश नहीं दिया जा सकता। इसके लिए कर्म
और शब्द में सामंजस्य स्थापित करना होगा ।यह भी स्पष्ट किया कि काँग्रेस और
मुस्लिम लीग क्या-कुछ कर पाती हैं, इसमें मेरी उतनी दिलचस्पी नहीं है, जितनी
इस बात में कि विद्यार्थी-जगत क्या करता है,जनता क्या करती है।इसमें गांधीजी
की आगामी नीति --स्वाधीनता संग्राम की अगुवाई के दौरान जिसे हकीकत बननी थी– की
झलक मिलती है। काँग्रेस की कमान गांधीजी ने संभाली, उससे पहले काँग्रेस
बैरिस्टर, जमींदार सरीखे उच्च वर्ग के लोगों तक महदूद थी। गांधीजी ने इसे
किसानों-मजदूरों से जोड़ा। पूरी साफगोई से कहा कि‘कोई भी कागजी कार्रवाई हमें
स्वराज नहीं दे सकती।’स्वराज पाने के लिए आचरण को कसौटी बनाना, नितांत मौलिक
बात थी।स्वराज के सवाल के साथ गांधीजी ने स्वच्छता का प्रश्न जोड़ा। इसके
माध्यम से व्यक्तिगत आचरण और सामाजिक आचरण का सवाल भी उठाया। इन्होंने कहा
कि अगर हमारे मंदिर भी सादगी और सफाई के नमूने न हों तो हमारा स्वराज कैसा
होगा? स्वराज का प्रश्न उठानेवाले लोगों की निगाहों से ऐसे मुद्दे बहुत दूर
थे। पर गांधीजी के हिसाब से ये तमाम मुद्दे स्वराज के बुनियादी प्रश्न थे।
इसके लिए जिम्मेवार श्रेष्ठता-ग्रंथि के रहते स्वराज नहीं आ सकता। ये
परेशानियाँ अँगरेजों के कारण पैदा नहीं हुई थीं। इसके लिये भारतवासी जिम्मेवार
थे। गांधीजी के लिए ये चिंताजनक बातें थीं; स्वराज की राह में रूकावट
भी। स्पष्ट है कि गांधी जिस ‘स्वराज’ की बात कर रहे थे, वह अलहदा था और
विशिष्ट भी।इतिहास के उस दौर में सक्रिय विचार-समूहों में स्वराज की अपनी-अपनी
कल्पना थी। वे सभी अपने-अपने ‘स्वराज’ को रूप और आकार देने के लिए जद्दोजहद कर
रहे थे। अपने-अपने मोर्चे पर स्वराज के ये तमाम तस्व्वुर एक स्तर पर एक-दूसरे
से संबद्ध थे तो दूसरे स्तर पर असंबद्ध भी।गांधी के जेहन में ‘स्वराज’ की जो
अवधारणा थी, उसकी दिशा में बढऩे के लिए बिना शक उक्त तमाम बातें देशवासियों की
कमियाँ थीं।
         दरभंगा के राजा सर रामेश्वर सिंह और कई वक्ताओं ने अपने संबोधन में
गरीबी के सवाल पर जोर दिया था।भाषण में गरीबी के प्रति चिंता और जीवन में
अश्लील प्रदर्शन एवं विलासिता गांधी को स्वीकार्य नहीं थी।इनके हिसाब से यह
स्वराज की भावना के प्रतिकूल था।
        इतिहास के उस दौर में जो तबके स्वतन्त्रता-आन्दोलन की अगुआई कर रहे
थे, उन्हें आजादी के लिए अपर्याप्त कहकर गांधीजी आन्दोलन की प्रकृति में बदलाव
लाने का सुझाव दे रहे थे। वे किसानों का जिक्र कर बहुसंख्यक आबादी को
स्वाधीनता-आन्दोलन से जोडऩे पर बल दे रहे थे। मुट्ठी भर वकील, डॉक्टर या
सम्पन्न जमींदार– जो कई मायनों में साम्राज्यवादी व्यवस्था के मजबूत अंग भी
थे– स्वाधीनता आन्दोलन को कितने दूर तक ले जा सकते थे? देश की बहुसंख्यक जनता
से कटकर देश-हित का कोई भी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता, देश की आजादी का आन्दोलन
तो बिल्कुल नहीं
   स्वाधीनता-आन्दोलन के तत्कालीन नेतृत्व को आजादी के लिए अपर्याप्त कहने
वाले गांधीजी उस दौर तक अँग्रेजी सत्ता को देश के लिए घातक नहीं मानते थे। जो
लोग उस हुकूमत को भगाना चाहते थे, वे देश की जनता को आन्दोलन से जोडऩे की
जरूरत नहीं समझ पाये थे। लिहाजा यह बात और भी महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है।
गांधीजी ने पूरी साफगोई से कहा था कि ‘‘यदि मुझे इस बात का विश्वास हो जाए कि
अँग्रेजों के रहते हुए इस देश का कदापि उद्धार न होगा– उन्हें यहाँ से निकाल
ही देना चाहिए– तो उनसे अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर यहाँ से चलते होने की
प्रार्थना करने में, मैं कभी आगा-पीछा न करूँगा और मुझे विश्वास है कि अपनी
दृढ़ धारणा के समर्थन में मरने को भी तैयार रहूँगा, ऐसा मरण ही मेरी सम्मति
में प्रतिष्ठा का मरण है।’’ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के
दौरान स्थान-स्थान पर लगाई गई खुफिया पुलिस को देख गांधी बेचैन थे। आयोजन में
वाइसरॉय शामिल हुए थे। उनकी सुरक्षा के मद्देनजर यह तैनाती हुई थी। गांधी के
मुताबिक इसका कारण था–अविश्वास। भारतीय लोगों के प्रति शासकों में अविश्वास।
खुफिया पुलिस की तैनाती गांधी के हिसाब से मरणान्तक दु:ख है। वे कहते हैं कि
इस प्रकार मरणान्क दु:ख भोगते हुए जीने की अपेक्षा क्या लार्ड हार्डिंग के लिए
सचमुच ही मर जाना अधिक श्रेयस्कर है। गांधीजी यह भी पूछते हैं कि खुफिया पुलिस
का जुआ हमारे सिर पर लादने का क्या कारण है? जवाब में इसके लिए हिंसक अराजक दल
को जिम्मेदार मानते हैं। गांधी खुद को अराजक ही कहते हैं, अहिंसक अराजक। वे
हिंसक अराजक दल की उत्पति का कारण मानते हैं– उतावलेपन का नशा और भय। ईश्वर के
प्रति अटूट आस्था वाले गांधी हिंसा में भरोसा रखने वाले लोगों को कहते हैं,
‘‘यदि आपका ईश्वर पर विश्वास हो और यदि आप उसका भय मानते हों तो फिर आपको किसी
से डरने का कोई कारण नहीं है;  फिर चाहे वे राजा-महाराजा हो, वाइसरॉय हों,
खुफिया पुलिस हों अथवा स्वयं सम्राट हों।’’गांधी के मन में हिंसक
अराजकतावादियों के स्वदेश-प्रेम के प्रति आदर-भाव था। वतन के लिए खुशी-खुशी
मरने वाले जज्बे की भी इज्जत करते थे। फिर भी उनके मार्ग से घोर असहमति रखते
थे।गांधी की मनोभूमि से वाकिफ कोई भी व्यक्ति कह सकता है कि वे जो सभ्यता
निर्मित करना चाहते थे, उसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी।भले ही वह हिंसा
किसी के भी प्रति हो। किसी पर, किसी तरह की, हिंसा गांधी को स्वीकार नहीं।
दुश्मन के प्रति भी हिंसा नहीं। यह हिंसा की संस्कृति को खारिज कर मनुष्यता पर
आधारित संस्कृति गढऩे की आकांक्षा का परिणाम है।हिंसा की राह पर चलने वालों को
कायर बताना काबिलेगौर है। यह कहकर गांधीजी ने आम समझ का विलोम प्रस्तावित किया
है। हमारी सभ्यता-संस्कृति का विकास जिस दिशा में हुआ है, उससे यह मिथ्या
धारणा पुष्ट हुई है कि हिंसा ताकत का पर्याय है; कि हिंसा का मार्ग मजबूती का
मिसाल है; कि हिंसा करने वाले पराक्रमी होते हैं। गांधीजी की चिंता और चिंतन
के केंद्र में, हिंसा को शौर्य माननेवाला, यह झूठा-सच रहा है। वे आजीवन अपने
शब्द और कर्म के जरिये इसका प्रतिलोम रचते रहे हैं। यह समझाते रहे हैं कि
अहिंसा वीरों का मार्ग है; कि अहिंसा मजबूरी में अपनाया जानेवाला साधन नहीं
है; कि अहिंसा की राह पर पराक्रमी और निडर लोग ही चल सकते हैं। अहिंसक
संस्कृति की रचना ही मनुष्यता का लक्ष्य होनी चाहिए।गांधी हिंसा के उत्स की
असली वजह कायरता को भी समाप्त करना चाहते थे। भय के कारण ही हिंसा पनपती है।
निहायत भिन्न परिस्थितियों में भी हिंसा के उत्स का कारण एक ही होता है– भय।
भले ही वह भिन्न-भिन्न तरह का भय हो। गांधी अभय-संस्कृति रचना चाहते थे;
जिसमें कोई किसी से भयभीत न हो। हिंसा से हासिल स्वराज से अहिंसक संस्कृति के
पनपने के लिए आवश्यक खाद-पानी मुमकिन नहीं है। गांधीजी अपने भाषण में, बंग-भंग
में, हिंसक आन्दोलनकारियों के दावे की चर्चा कर रहे थे। ऐन तभी मंच पर बैठी
एनी बेसेंट ने हस्तक्षेप करते हुए भाषण शीघ्र समाप्त करने के लिए कहा।नागवार
लगने वाली बात थी– हिंसक आन्दोलनकारियों की चर्चा के पूर्व की बात; जिसमें वे
देश का उद्धार न होने की समझ आने पर, अँग्रेजों से बोरिया-बिस्तर समेटकर जाने
के लिए कहने और इसके लिए मरने को भी तत्पर रहने को कह रहे थे। साथ ही हिंसक
आंदोलनकारियों के स्वदेश प्रेम और इसके लिए मृत्यु को गले लगाने के प्रति
सम्मान की चर्चा। युवजनों के बीच सार्वजनिक सभा में ऐसी बातें कहने-सुनने से
वाकिफ नहीं था तत्कालीन नेतृत्वकारी तबका। वह भी ऐसे आयोजन में जिसमें
ब्रिटिश-सत्ता के प्रतिनिधि शिरकत कर रहे हों! यहाँ तक पहुँचकर गांधी के भाषण
की दिशा साफ हो चुकी थी। बेसेंट सरीखी प्रबुद्ध शख्सियत इसे समझने में चूक
नहीं सकतीं!
(30 जनवरी 2016 को जनसत्ता में प्रकाशित )
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