[दीवान]प्रभात खबर को कभी न क्यों नहीं कह पाता ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Jun 15 03:07:42 CDT 2016
प्रभात खबर के 25 साल का "सफरनामा"( एक अखबार का 5 वर्षों का) मेरे हाथ में
है. मुझे नहीं पता कि ये प्रति किसकी पहल से मुझे भेजी गई है..लेकिन प्रभात
खबर और उसकी टीम को इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया. निराला ने जिस जतन से इसका
संपादक किया है, मुझे ये प्रति स्नेह के साथ न भी भेजी गई होती तो इसे खरीदकर
पढ़ता, अपने पास रखता और मीडिया के छात्रों से अपील करता कि आप इसे जरूर पढ़ें.
ऐसा इसलिए नहीं कि ये मेरे बचपन के अखबार के सफर की कहानी है. मेरे कॉलेज के
शहर रांची से निकलनेवाले अखबार पर छपी किताब है. जरूरी तौर पर इसलिए कि ये देश
एक ऐसे अखबार के बहाने क्षेत्रीय पत्रकारिता का ब्यौरा है जिसे पिछले कुछ
सालों से डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नाम से अलग से शुरु हुए पाठ्यक्रम में बड़े ही
कॉर्पोरेट, सीएसआर, एनजीओ स्टाइल में पढ़ाने का चलन शुरू हुआ है. इस अंक से
गुजरने के बाद आप बेहतर समझ सकेंगे कि कम संसाधन में कैसे कोई मीडिया संस्थान
खड़ा किया जा सकता है और मीडिया का मतलब सिर्फ खबरें छापना भर नहीं बल्कि
एक्शन ऑरिएंटेड सक्रिय समाज का निर्माण करना होता है.
किताब की भूमिका में जब मैंने निराला की लिखी पंक्ति पढ़ी - प्रभात खबर में
काम कर रहे या कर चुके साथियों-सहयोगियों से मिलने के बाद उनके बौद्धिक आकर्षण
का प्रभाव था या प्रभात खबर के सरोकारी पत्रकारिता का आकर्षण ? या बगैर मिले
ही हरिवंशजी के द्वारा कहे गये उस एक वाक्य का असर था- कहां हो यार ! आओ रांची
तो मिलो.. " कि बनारस में मिलनेवाली दुगनी से भी ज्यादा सैलरी छोड़कर प्रभात
खबर के साथ हो लिए तो मुझे भी प्रभात खबर के साथ भावनात्मक जुड़ाव की वजह साफ
होने लगी.
साल 2000-01 का वो दौर था. हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स ने बहुत ही
आक्रामक ढंग से रांची में कदम रखा था. तेजी से वो वहां के अखबारों की टीम
तोड़ने में लगे थे. यहां तक कि संत जेवियर्स कॉलेज में हिन्दी, अंग्रेजी पढ़
रहे सेकण्ड इयर के छात्रों को भी रखने लग गए थे. उनमे से ज्यादातर वो लोग थे
जिनकी अकादमिक और बौद्धिक स्तर पर कोई समझ नहीं. उन्हें लोग हवाबाज कहते.
बाइलाइन जब उनकी स्टोरी आने लगी तो ये बात भी उन्होंने खुद साबित कर दी.
दो-चार दिनों के लिए तब के संपादक ने हमें भी आगे-पीछे करवाया लेकिन उस वक्त
के मेरे मेंटर दिनेश्वर प्रसाद ने बहुत प्यार से समझाया- देखो, इस तरह से
अखबारी नौकरी करने के मौके और आगे भी मिलेंगे, क्या पता तुम्हें ऐसा करने की
नौबत ही न आए और अखबार तुम्हारी बातें खुद छापने लगे. तुम्हें तो लोगों तक
अपनी बात पहुंचानी है न, उसके दूसरे तरीके भी हैं..तुम बस जमकर साहित्य पढ़ो,
अपनी समझ विकसित करो.
जून की दुपहरी में दिनेश्वरजी ने ये बात इतने प्यार से समझायी थी और वो खुद
सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति थे कि ये बात मेरे मन में बैठ गई. मैंने आगे कोई
कोशिश नहीं की. खर्चे के लिए ट्यूशन पढ़ाता रहा..लेकिन
प्रभात खबर के थपड़पखना, रांची के सिटी दफ्तर में मैं पाठकों की चिठ्ठी लेकर
अक्सर जाता. वहां मधुकरजी मिलते, कुछ बात तो नहीं होती, बस इतना कहता- सर लिखा
है, देख लीजिएगा. वो चिठ्ठी रख लेते और तीन-चार दिनों बाद वो छप जाती. हम इतने
से बहुत खुश रहते..
रांची शहर छूट गया और रोजाना इस अखबार को पढ़ने की आदत भी..बीच-बीच में ईपेपर
देखता. इस बीच ब्लॉग और बाद में फेसबुक के जरिए धुआंधार लिखता रहा. मुझे
प्रिंट फोबिया है तो प्रिंट मे छपने की न तो बहुत कोशिश की और न ही बहुत इच्छी
रहती. कुछ लोग जानने लगे थे और पढ़ते थे. हमारी बस इतनी ही दुनिया थी कि
धीरे-धीरे प्रिंट के लोगों ने संपर्क किया. उनके कहने पर लिखने लगे औऱ इसी में
एक दिन प्रभात खबर ने भी कहा- आप लिखिए. सबसे पहले पटना से रियाज-उल-हक का फोन
आया. मेरी पोस्ट पढ़ी थी- तब मां भी होती थी, सिनेमा भी. उन्होंने कहा- आप इसे
और बेहतर करके हमें भेज सकते हैं. मैंने बिना कुछ पूछे, प्रभात खबर के नाम पर
बेहतर करके भेज दिया.
बाद में मुंबई से अनुप्रिया, मनोरंजन और टीवी पर लिखने कहती तो लिख दिया.
दिल्ली से अवनीश मिश्रा और प्रकाश के रे. कौन लिखने कह रहा है, इससे कभी फर्क
नहीं पड़ता. बस प्रभात खबर के लिए लिखना है, लिख दिया. जमशेदपुर मे
अखिलेश्वरजी, रंजीतजी ने बुलाया, मिलने चले गए.
लिखने की स्थिति हमेशा अनुकूल नहीं रहती. कभी बीमार होते, कभी बाहर होते, कभी
बिना नेटवाली जोन में होते. फिर दो घंटे-चार घंटे की शॉर्ट नोटिस पर लिखना
होता. पिछली बार तो प्रकाश ने फोन किया. रात में प्रत्युषा बनर्जी मामले में
एनडीटीवी पर मेरी फोनो चली थी. दो बज रहे थे, चार बजे तक लेख चाहिए था. उस
वक्त मैं जेएनयू के जंगलों में भटक रहा था. मन किया- न कर दूं लेकिन फिर वहीं
पत्थर पर बैठकर मोबाईल से लिखा..बड़ी मुश्किल से वाइ-फाइ पासवर्ड जुगाड़कर मेल
कर दिया.
ये सब करते हुए हम प्रभात खबर पर कोई एहसान नहीं कर रहे होते हैं और न ही अपनी
पीआर दुरुस्त कर रहे होते हैं. बस इसलिए लिख रहे होते हैं कि हम आखिर-आखिर तक
पाठक मंच के लिए लिखकर शहर से विदा हो लिए, कभी मेरे नाम से लेख नहीं छपा और
दूसरा कि जब इस अखबार के पहले पन्ने पर छपा देखता- अखबार नहीं, आंदोलन तो यकीन
गहरा होने लग जाता. हम इस अखबार को पढ़ते हुए लिखने-पढ़ने की दुनिया में बड़े
हुए. एहसान रहा है इस अखबार का हम पर..
बाकी हरिवंशजी को लेकर निराला ने जो लिखा है, मेरे पास बहुत ज्यादा व्यक्तिगत
अनुभव नहीं है. बस एक बार की मुलाकात है. राजेन्द्र भवन, दिल्ली में उनको
पत्रकारिता पर बोलते हुए सुन रहा था और उसी बीच उन्होंने ग्राम्शी और जॉक
देरिदा की चर्चा की. हम व्याख्यान के बाद बाहर आए और इतना ही कहा- आपको सुनकर
बहुत अच्छा लगा. आपने बहुत गहरी बातें की.
बाहर वो अनौपचारिक ढंग से बतियाने लगे. बेहद सहज लगे और रांची आने पर मिलने
कहा. बस निराला की तरह यार शब्द नहीं लगाया लेकिन ये जानकर कि मैं संत
जेवियर्स रांची से पढ़ा हूं, उनकी नजरों में खास किस्म की आत्मीयता थी..
किताब में छपे एक-एक लेख और नाम से गुजर रहा हूं. दयामणि बारला, बलवीर पुंज,
रवि भूषण..लग रहा है, एक छूटी हुई दुनिया फिर से दोहरा रही है, बीए की पढ़ने
की दुनिया फिर से लौट आई है.
[image: Vineet Kumar's photo.]
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